ज्याँ-पॉल सार्त्र का कथन “दूसरे लोग ही हमारे लिए नर्क हैं” सुनने में कठोर लगता है, लेकिन इसका अर्थ बहुत व्यावहारिक और जीवन से जुड़ा हुआ है। सार्त्र यह नहीं कहते कि इंसान बुरा होता है, बल्कि वे यह समझाना चाहते हैं कि जब हम अपने सुख-दुख और पहचान को पूरी तरह दूसरों की राय पर छोड़ देते हैं, तब जीवन कष्टमय हो जाता है। मनुष्य अकेले में स्वच्छंद महसूस करता है, लेकिन समाज में आते ही वह यह सोचने लगता है कि लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे, कैसे आंकेंगे। यही चिंता धीरे-धीरे मन को अशांत कर देती है।
भारतीय दर्शन में भी यह बात अलग रूप में मिलती है। गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति फल और प्रशंसा की इच्छा से मुक्त होकर कर्म करता है, वही शांति पाता है। लेकिन जब हम दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए जीते हैं, तब हम अपने वास्तविक स्वभाव से दूर हो जाते हैं। सार्त्र इसी स्थिति को “नर्क” कहते हैं—जहाँ मनुष्य बाहरी नजरों का कैदी बन जाता है।
भारतीय सोच में अहंकार (अहं) और आसक्ति को दुख का कारण माना गया है। जब हमें यह आसक्ति हो जाती है कि लोग हमें अच्छा मानें, सम्मान दें या स्वीकार करें, तब वही लोग हमारे मानसिक कष्ट का कारण बन जाते हैं। यही बात सार्त्र पश्चिमी भाषा में कहते हैं कि दूसरों की दृष्टि हमें एक वस्तु बना देती है और हमारी स्वतंत्रता छिन जाती है।
इसलिए “दूसरे लोग ही हमारे लिए नर्क हैं” का अर्थ यह है कि समस्या दूसरे लोग नहीं हैं, समस्या हमारी निर्भरता है। यदि मनुष्य भारतीय परंपरा के अनुसार आत्म-चेतना, संतुलन और वैराग्य रखे, तो वही समाज नर्क नहीं, बल्कि सीख और सहयोग का स्थान बन सकता है। सार्त्र और भारतीय दर्शन दोनों यह सिखाते हैं कि सच्ची शांति तब मिलती है, जब मनुष्य अपने मूल्य स्वयं तय करे, न कि दूसरों की नजरों से खुद को देखे।
The people who say good things about us today, may say bad things about us tomorrow and the attitude of people will not be the same tomorrow as it is today, it will change and this will hurt your mind.this is natural.so never upset your mind other priview.%20jean%20paul%20satre.webp)
0 टिप्पणियाँ