some thought of german philosopher immanuel kant on morality


 नैतिक दर्शन के क्षेत्र में कांट का योगदान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना ज्ञानमीमांसा में। उनका नैतिक दर्शन कर्तव्य-आधारित है, जिसमें किसी कर्म की नैतिकता उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना और कर्तव्यबोध से निर्धारित होती है। कांट के अनुसार केवल सद्भावना ही पूर्णतः नैतिक होती है। उन्होंने नैतिक नियम को “अनिवार्य आज्ञा” के रूप में प्रस्तुत किया, जिसका मूल सिद्धांत यह है कि व्यक्ति ऐसा आचरण करे जिसे वह सार्वभौमिक नियम के रूप में स्वीकार कर सके। इसके साथ ही कांट ने यह भी कहा कि मनुष्य को कभी केवल साधन के रूप में नहीं, बल्कि सदैव उद्देश्य के रूप में देखा जाना चाहिए। यह विचार मानव गरिमा और मानवाधिकारों की दार्शनिक नींव बन गया।

ईश्वर, आत्मा और स्वतंत्र इच्छा के प्रश्न पर कांट ने एक मध्य मार्ग अपनाया। उन्होंने इनकी सैद्धांतिक सिद्धि से इंकार किया, लेकिन नैतिक जीवन के लिए इन्हें आवश्यक मान्यताओं के रूप में स्वीकार किया। उनके अनुसार यदि नैतिकता को सार्थक बनाना है तो आत्मा की अमरता, ईश्वर का अस्तित्व और स्वतंत्र इच्छा को मानना आवश्यक है, भले ही इन्हें तर्क से सिद्ध न किया जा सके।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ